बँटवारा:  समस्या या समाधान।

प्रजातंत्र के पेड़ पर कौवा करे किलोल,

टेप-रिकार्डर में भरे,चमगादड़ के बोल

नित्य नई योजना बन रही जन-जन के कल्याण  की

जय बोलो बेईमान की।

बँटवारा क्या समस्याओं का पूर्णकालिक समाधान है या समस्याओं का आरंभ ?

इस संदर्भ में मेरा मानना है कि जिस शब्द का अर्थ ही अलगाव हो,जो शब्द स्वार्थपरक महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए महत्वपूर्ण हो उससे ही समस्या का उद्भव होता है। बँटवारा देश का हो, राज्य का हो या परिवार का इससे प्रभावित सभी होते हैं चाहे वे प्रत्यक्ष समर्थन करें या, अनिच्छा, मजबूरीवश मूकदर्शक बन अपना मौन समर्थन दें। सरहदें मात्र उनके क्षेत्र को ही नहीं बाँटती बल्कि दिलों को भी अनेक टुकड़ों में विभाजित करती है जिसके परिणामस्वरूप पहले एक-दूसरे की सुख-समृद्धी की कामना करनेवाले लोग बाद में दुःख और विनाश के षड्यन्त्रों में लिप्त हो जाते है।

प्रश्न ये भी उठता है कि क्या बँटवारे के बाद लोगों का गुजर-बसर सुख और शांति से होने लगता है? यदि ऐसा होता तो वे लोग कभी दुःखी और असंतुष्ट नहीं होते जिन्होंने कभी बँटवारे को चुना था। किसी विशाल वृक्ष की शाखाओं को वृक्ष से अलग कर दिये जाने पर दोनों ही समाप्त हो जाता है यदि परिस्थिति से लड़कर कुछ शाखाएँ किसी तरह अपना अस्तित्व बचाने में सफल हो भी जाते हैं तो भी  किसी को लाभ पहुँचाने की स्थिति में नहीं होते जो पहले अविभाजित वृक्ष के रूप में असंख्य लोगों को मीठे फल व शीतल छाया देते थे। यदि नहीं तो बँटवारे से किसको फायदा है ? यह सोचकर फैसला लेना आवश्यक हो जाता है कि चंद अवसरवादी तत्वों की स्वार्थपूर्ति का दण्ड  अधिकांश आबादी के द्वारा वहन करना कहाँ की समझदारी है? सर्वसाधारण को अपने जीवनयापन के लिए कमाना ही पड़ेगा तब जाकर कहीं उनके परिवार के लिए दो वख्त का निवाला मिल सकेगा चाहे वो लंदन,न्यूयार्क,गुजरात,बंगाल या कहीं के भी निवासी क्यों न हो।

आवश्यकता है कि लोग शिक्षा,स्वास्थ्य,सड़क,सिचाई,सामाजिक सुरक्षा और समग्र विकास जैसे को मुद्दा बनाकर उनके ऊपर दबाव बनाएं जिन्हें इसी कार्य के लिए अपना बहुमूल्य वोट देकर प्रतिनिधि चुना था न कि उनके हाथों की कठपुतली बनकर उनके स्वार्थसिद्धि का माध्यम बन अपने सुख,शांति को नष्ट करें।

सत्य को सत्य और असत्य को असत्य करने का सामर्थ्य जब लोगों को हो जायेगा, उसी समय अपना देश सुखी, समृद्ध और आत्मनिर्भर हो जायेगा।

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